श्रीमद्भगवद्गीता का संदेश: आधुनिक जीवन की समस्याओं का सनातन समाधान
श्रीमद्भगवद्गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि मानव जीवन का संपूर्ण मार्गदर्शन है। महाभारत के युद्धक्षेत्र में अर्जुन और श्रीकृष्ण के संवाद के रूप में दिया गया यह उपदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना हजारों वर्ष पहले था। गीता मनुष्य को उसके कर्तव्यों, कर्मों और जीवन के उद्देश्य से परिचित कराती है।
गीता का केंद्रीय संदेश है — कर्मयोग। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने पर है, फल पर नहीं। जब व्यक्ति परिणाम की चिंता छोड़कर कर्तव्य करता है, तो वह मानसिक तनाव से मुक्त हो जाता है। आज की प्रतिस्पर्धात्मक दुनिया में यही चिंता मनुष्य को भीतर से तोड़ देती है।
गीता यह भी सिखाती है कि जीवन में आने वाले सुख-दुख क्षणिक हैं। जो व्यक्ति इनसे प्रभावित नहीं होता, वही सच्चा योगी है। गीता का ज्ञान आत्मनियंत्रण, धैर्य और विवेक को विकसित करता है। यही गुण किसी भी व्यक्ति को सफल और संतुलित बनाते हैं।
गीता में भक्ति, ज्ञान और कर्म — तीनों मार्गों का सुंदर समन्वय है। यह किसी एक रास्ते को श्रेष्ठ नहीं ठहराती, बल्कि व्यक्ति की प्रवृत्ति के अनुसार मार्ग चुनने की स्वतंत्रता देती है। यही इसकी व्यापकता है।
आधुनिक जीवन में जहां अवसाद, चिंता और असंतोष तेजी से बढ़ रहा है, वहां गीता आत्मिक शांति प्रदान करती है। इसके श्लोक जीवन की कठिन परिस्थितियों में मार्गदर्शक बनते हैं। गीता यह सिखाती है कि आत्मा अजर-अमर है, इसलिए भय का कोई स्थान नहीं होना चाहिए।
गीता का अध्ययन व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाता है। यह उसे स्वयं से प्रश्न करने और उत्तर खोजने की प्रेरणा देती है। इसी कारण गीता केवल हिंदुओं तक सीमित नहीं, बल्कि विश्वभर में सम्मानित ग्रंथ है।








