याचना नहीं, अब रण के लिये तैयार होईये… भाग-1

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याचना नहीं, अब रण के लिये तैयार होईये… भाग-1

वरिष्ट पत्रकार विनोद पाठक की कलम से……..

गढ़वा: पलामू को विभाजित होने से पूर्व वर्ष करीब 1990 के आसपास उस समय के पलामू के सबसे वरिष्ठ पत्रकार रामेश्वरमजी के क्रांति कुटीर में कुछ सामाजिक लोगों ने बैठकर एक प्रस्ताव पारित किया था जिसमें उन्होंने पलामू को केंद्र शासित प्रदेश बनाने की मांग की थी. इसके लिये लोगों ने भारत सरकार से मांग करने के साथ-साथ इसके लिये एक चरणबद्ध आंदोलन चलाने की आवश्यकता महसूस की थी.

इसके लिये अनेकों तर्क दिये गये थे. यद्यपि इस विषय पर जमीनी स्तर पर कोई ठोस पहल कभी नहीं किया जा सका. लेकिन रामेश्वरमजी जबतक जीवित रहे, उनकी सोच में यह विषय हमेशा बना रहा. वे हर प्रमुख अवसरों पर इस मुद्दे को उठाते थे. यदा-कदा इससे संबंधित बयान अखबारों में भी आ जाते थे. तब जब एक ओर बिहार से छोटानागपुर-संथालपरगना को अलग करने की मांग को लेकर झारखंड आंदोलन जोर पकड़ रहा था. उसी समय तब के कुछ राजनीतिज्ञों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों की यह सोच थी कि झारखंड राज्य में रहने की बजाय पलामू को अलग स्वायत्तशासी क्षेत्र के रूप में मान्यता मिलनी चाहिये.

यद्यपि तब कुछेक लोगों को छोड़कर अधिकांश लोग न सिर्फ इसको फालतू बात बताते थे, बल्कि इसे पूरी तरह से हास्यास्पद कहकर इसका मजाक भी उड़ाते थे. सचमुच में तब जबतक अभिभाजित पलामू का क्षेत्र बिहार राज्य के अधीन था, लोगों को इसकी प्रासंगिगता समझ में नहीं आती थी. चुकि मेरी पत्रकारिता की शुरूआत भी उसी समय डालटनगंज से ही हुई थी और मेरा केंद्र विंदू भी रामेश्वरमजी की क्रांति कुटीर में ही था. इसलिये मैं भी शुरू से ही एक जिज्ञासु की तरह अपने सभी वरिष्ठों के इस विषय पर दिये जानेवाले तर्कों को सुनता-समझता था.

आज जब बिहार से झारखंड न सिर्फ अलग हो चुका है, बल्कि इसकी रजत जयंती भी मनायी जा चुकी है और क्रांति कुटीर से शुरू हुये विषय के करीब साढ़े तीन दशक हो चुके हैं, वह सोच कितना दूरदर्शी था, वह आज महसूस हो रहा है, जब झारखंड गठन के ढाई दशक में इस राज्य की दिशा देखने को मिल रही है कि हमारे झारखंड प्रदेश को हमारे नेता किस दिशा में जा रहे हैं. आज जब पलामू-गढ़वा के विद्यार्थियों पर जिस तरह से यहां की सरकार भाषा थोप रही है. तब कुछ लोगों की नींद खुल रही है कि हमारे बच्चों के साथ तो सरासर अन्याय हो रहा है.

यहां तक कि विकास के मामले में भी बिहार की ही तरह पलामू प्रमंडल के इस क्षेत्र के साथ झारखंड बनने के बाद भी सौतेला व्यवहार हो रहा है. इसके बाद कुछेक लोगों के दिमाग में बात आ रही है कि पलामू प्रमंडल के लोगों को झारखंड से अलग कर देना चाहिये. अफसोस की बात कि यह सोच हमें समय पर नहीं जागृत हो सकी. झारखंड बनने के दौरान हमें समझ में नहीं आया कि झारखंड अलग तो हो जायेगा, लेकिन इसके साथ झारखंड प्रदेश के बिहार, यूपी और छतसीगढ़ की सीमा से जुड़े हुये इस क्षेत्र के लोगों को कितना भला हो सकेगा, जिसकी भाषा, संस्कृति और खान-पान बिलकुल ही झारखंडी संस्कृति से लगभग भिन्न रही है. खासकर तब जब विकास के मामले में भी यह क्षेत्र बिहार राज्य के समय भी पूरी तरह से उपेक्षित रहा है.

क्या आनेवाली झारखंड सरकार झारखंड प्रदेश के इस छोर पर बसे लोगों को भी अपने विकास के विजन में शामिल कर साथ ले चल सकेगी. खैर देर से ही सही जब पलामू प्रमंडल के कुछ अभिभावकों-नेताओं को यह बात जब समझ में आने लगी है कि झारखंड में शामिल होना उनके तथा उनके बच्चों के लिये लाभकारी नहीं था, बल्कि उनके बच्चों के साथ अन्याय हो गया है, तो इससे कुछ लाभ सिर्फ अपने आप को कोसने और अखबारों-सोशल मीडिया पर भड़ास उतारने मात्र से नहीं होगा, बल्कि इसके लिये मजबूत पहल करनी होगी. अपने लिये न सही, अपने बच्चों और भावी पीढ़ियों के भविष्य के लिये एक सांगठनिक मंच बनाकर संघर्ष की शुरूआत करनी होगी.

पलामू प्रमंडल की करीब 50 लाख से उपर की आबादी में अधिकांश गैर आदिवासी निवास करते हैं, इनके भविष्य के लिये यदि आज भी कोई ठोस पहल शुरू नहीं हुई, तो आनेवाली पीढ़ी हमें कभी माफ नहीं करेगी. यद्यपि इसके परिणाम को लेकर अधिकांश लोग निराशाजनक बात करेंगे. वे पूछेंगे कि अब सिर पीटने के सिवाय और किया ही क्या जा सकता है. इस प्रकार के आंदोलन से अब क्या लाभ होगा. लेकिन मैं कहता हूं कि इसका लाभ होगा. यदि पलामू प्रमंडल की आबादी अपने हक और अधिकारों की आवाज संगठित होकर उठाती है, तो इसका व्यापक प्रभाव पड़ेगा और इसके दूरगामी परिणाम भी सामने आयेंगे. लोकतंत्र में और हम कर ही क्या सकते हैं. हमारे पास एकमात्र यही रास्ता है. जो बीत गयी, सो बात गयी. अब जब जगे, तभी सबेरा…वाली कहावत के हिसाब से हमें जागरूक होकर एक ठोस विजन बनाकर आगे के लिये पहल करनी होगी. मैं बताता हूं कि इस परिस्थिति में हम सबको क्या करना चाहिये. पलामू प्रमंडल के लोगों के पास झारखंड से अपने आपको अलग करने की मांग करना पहले से ही प्रासंगिक था और आज झारखंड गठन के ढाई दशक के बाद झारखंड सरकार की दिशा को देखकर तो यह पूरी तरह से और अधिक प्रासंगिक हो चुका है. इसलिये कि पलामू प्रमंडल को झारखंड से अलग करने की वजह एक नहीं अनेको हैं.

अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के बाद अब आदिवासी तुष्टीकरण की राजनीति-

जेपीएससी और जेटेट की परीक्षा में हिंदी, भोजपुरी और मगही भाषा को हटाकर पलामू क्षेत्र के इस भाषा से जुड़े विद्यार्थियों को परीक्षा में अयोग्य ठहराने का प्रयास एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा है. सरकार को भय है कि यदि इस क्षेत्र के विद्यार्थियों को हाशिये पर नहीं किया गया, तो उनका राज्य के रोजगार के सभी अवसरों में वर्चस्व हो सकता है. आप गौर कीजिये कि राज्य में आदिवासियों की अधिकतम आबादी 28 प्रतिशत(2011 की जनगणना के अनुसार झारखंड की कुल 3.29 करोड़ में करीब 32 अनुसूचित जनजातियों को मिलाकर लगभग 86.45 लाख ) है. जबकि 72 प्रतिशत आबादी गैर आदिवासियों की है. हम आदिवासियों के न तो पिछड़ेपन से इनकार करते हैं न ही इनके विकास के लिये बनायी जा रही नीतियों के खिलाफ हैं. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि वोट बैंक की राजनीति के लिये सिर्फ आदिवासी तुष्टीकरण की बात की जाये और शेष 72 प्रतिशत बहुसंख्यक आबादी के विकास सरकार के लिये कोई मुद्दा ही न हो.

आप याद कीजिये जबसे झारखंड बना है, बस जैसे पहले से कुछ तथाकथित सेक्यूलर नेता राजनीति में अल्पसंख्यक तुष्टीकरण का सहारा लेते रहे हैं, वैसे ही झारखंड बनने के बाद यहां आदिवासी तुष्टीकरण की राजनीति हो गयी है. आप भाषा पर गौर कीजिये. आप बार-बार सुनते होंगे कि आदिवासी सरकार और आदिवासी मुख्यमंत्री को परेशान किया जा रहा है. बजाय यह आप कभी नहीं सुने होंगे कि एक चुनी हुई सरकार या चुने हुये दल के मुख्यमंत्री को परेशान किया जा रहा है.

इसी तरह हमेशा आदिवासी विकास की बात ही चुनावों अथवा प्रत्येक महत्वपूर्ण अवसरों पर की जाती रही हैं और सारी आकर्षक घोषणाएं भी आदिवासियों के नाम पर की जाती रही हैं. लेकिन इसका चुकि बहुसंख्यक आबादी से कभी विरोध नहीं होता, इसलिये आजतक सरकार इसी नारे के सहारे राजनीति करती चली आ रही है. झारखंड से अधिक आदिवासियों वाले और भी राज्य हैं. बगल में ही छतीसगढ़ में झारख्रंड प्रांत से अधिक वहां की कुल आबादी का 32 प्रतिशत आदिवासियों की आबादी है. लेकिन सरकार आदिवासियों के नाम पर इस तरह से सरकार पर गैर आदिवासियों के साथ भेदभाव की बात कभी सामने नहीं आयी, चाहे किसी भी दल की सरकार क्यों न रही हो. इसमें भी पलामू प्रमंडल की बात तो अलग ही है.

गढ़वा जिले में जहां मात्र 19 प्रतिशत वहीं पलामू में मात्र नौ प्रतिशत ही अनूसूचित जनजाति की आबादी है. इस प्रकार गढ़वा जिले में 81 प्रतिशत और पलामू जिले में 91 प्रतिशत गैर आदिवासी समाज के लोग निवासी करते हैं. लातेहार में यह संख्या ज्यादा है, जहां करीब 45 प्रतिशत आदिवासियों की आबादी है. फिर भी वहां भी गैर आदिवासी बहुलता में हैं. इस प्रकार पलामू प्रमंडल में आदिवासियों की मात्र 24 प्रतिशत आबादी है, जबकि 76 प्रतिशत गैर आदिवासी हैं. हैरत की बात है कि पलामू प्रमंडल के इन 24 प्रतिशत आबादी को देखा जाये, तो झारखंड बनने के इस ढाई दशक में कुछ गिने-चुने परिवारों को छोड़कर आदिवासियों के लिये लायी गयी तमाम योजनाओं के बावजूद उनकी स्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ है. लेकिन राजनीति उनके नाम पर जरूर होती रही और उन्हीं की आड़ में गैर आदिवासियों के साथ भेदभाव भ्री होता रहा है.

नेताओं को बयान से आगे बढ़ना होगा और पार्टी की गुलामी से बाहर निकलना होगा-

सभी राजनीतिक दल के नेताओं से आग्रह है कि पलामू प्रमंडल के साथ सरकार से किये जा जा रहे निरंतर सौतेला व्यवहार को लेकर सिर्फ अखबारों में बयान देने मात्र से सरकार पर कोई असर नहीं पड़नेवाला है. बल्कि इसके लिये ठोस पहल कर इस मुद्दे को जन आंदोलन का रूप देना होगा. इसके लिये पार्टी की गुलामी से बाहर निकलना होगा. अपने भावी पीढ़ी के लिये यदि आप सचमुच चिंतित हैं, तो आपको यह साहस करना होगा. इसका हम नहीं कह सकते कि आपको राजनीतिक लाभ मिलेगा या कितना मिलेगा, लेकिन इतना जरूर कहेंगे कि पलामू प्रमंडल के इतिहास में आपको जरूर स्थान मिलेगा.

समय का तकाजा है कि वर्ततान परिस्थिति को देखते हुये आप राजनीतिक दल के लोग विशेषकर युवा नेता व सामाजिक संगठन अपना लाभ देखने की बजाय अपने भावी पीढ़ियों का लाभ देखते हुये सरकार को झुकाने के लिये सभी एकजुट हो जाइये और पलामू प्रमंडल को झारखंड से अलग करने की मांग को बुलंद कीजिये. फिर देखिये इसका न सिर्फ झारखंड की राजनीति पर बल्कि पूरे देश की राजनीति पर क्या असर होता है.

कहते हैं कि लोकतंत्र में कभी-कभी अपनी बातों को शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचाने के लिये उंचे आवाज में बोलना पड़ता है. बात नहीं सुननेवालों के पास उसका ध्यान आकर्षित करने के लिये चिल्लाना भी पड़ता है. यह कोई गुस्ताखी नहीं है. बल्कि अपना और अपने बच्चों का हक को मनवाने की बात है. अपने और अपने भावी पीढ़ियों को सुधारने की बात है. आप चुप नहीं रहिये. क्योंकि दिनकर की पंक्ति पढ़े हैं न. जो तटस्थ है समय लिखेगा उसका भी अपराध. इस अपराध से बचिये और इस भेदभाव के खिलाफ इस निर्णायक लड़ाई के लिये एक मंच बनाकर आंदोलन शुरू करिये. याचना नहीं, अब रण होगा………….(सोर्स- vinod pathak facebook Profile)

GPL NEWS
Author: GPL NEWS

वर्षों के अनुभव के साथ झारखंड की ज़मीनी सच्चाइयों को निर्भीक और निष्पक्ष पत्रकारिता के माध्यम से सामने लाना। सरकार की योजनाओं से लेकर आम लोगों से जुड़े मुद्दों पर सटीक, विश्वसनीय और जिम्मेदार समाचार प्रस्तुत करना उद्देश्य है

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